“कलमगार” शब्द मेरे लिए नया है, लेकिन इस शब्द में मेरी दिशा छिपी है।

मैं अपने को अभी लेखक नहीं कहता। लेखक होना बड़ी बात है। लेकिन मैं यह जरूर कह सकता हूँ कि मैं लिखना सीख रहा हूँ। सिर्फ अपने लिए नहीं, उन लोगों के लिए भी जिनकी आवाज़ रोज़मर्रा की जिंदगी में दब जाती है।

बहुत लोग बोलते हैं, लेकिन उनका कहा कहीं दर्ज नहीं होता।
बहुत लोग दुख झेलते हैं, लेकिन उनका दुख खबर नहीं बनता।
बहुत लोग मेहनत करते हैं, लेकिन उनकी मेहनत के पीछे का जीवन कोई नहीं पढ़ता।
बहुत लोग व्यवस्था से टकराते हैं, लेकिन उनकी टक्कर फाइलों में नहीं आती।

यही आवाज़ें धीरे-धीरे दफन हो जाती हैं।

मैं उन आवाज़ों का मालिक नहीं हूँ।
मैं उनका नेता भी नहीं हूँ।
मैं बस कोशिश करना चाहता हूँ कि जो दिखता है, जो सुनाई देता है, जो महसूस होता है, उसे दर्ज किया जाए।

मेरे पास बड़ी कुर्सी नहीं है।
मेरे पास बड़ा दफ्तर नहीं है।
मेरे पास बड़ा मंच नहीं है।
मेरे पास सड़क है, ई-रिक्शा है, मजदूरी का अनुभव है और अब एक कलम है।

मेरे लिए कलम सिर्फ लिखने की चीज़ नहीं है।
यह याद रखने की चीज़ है।
यह गवाही देने की चीज़ है।
यह कहने की चीज़ है कि हम थे, हमने देखा, हमने सहा, हमने समझा और हमने दर्ज किया।

रिक्शावाला नवीन इसी रास्ते पर चलने की कोशिश है।

यहाँ आवाज़ें सजाने के लिए नहीं लिखी जाएँगी।
यहाँ आवाज़ें दर्ज करने के लिए लिखी जाएँगी।

क्योंकि जो आवाज़ दर्ज नहीं होती, वह समय के साथ दफन हो जाती है।

और अगर उसे कोई लिख दे, तो वह सिर्फ आवाज़ नहीं रहती — वह दस्तावेज़ बन जाती है।