आज शनिवार, 25 जुलाई 2026 है। सुबह लगभग 7 बजे मेरी नींद खुली। रोज की तरह नित्यक्रिया से फ्रेश हुआ, फिर कमरे और किचन में झाड़ू लगाई, बर्तन साफ किए। उसके बाद रोटी और सब्जी बनाई, खाना खाया और कुछ देर आराम करने के बाद काम पर निकल गया。
आज शुरुआत उसी शोरूम से हुई जहाँ कल काम कर रहा था। सबसे पहले हम दो लोगों ने मिलकर पाँच बोरी सीमेंट तीसरी मंजिल तक पहुँचाई। उसके बाद मुझे दूसरी साइट पर भेज दिया गया। वहाँ मुश्किल से दो-चार मिनट रुका था कि फिर छेनी, हथौड़ी और हैमर मशीन लेकर तीसरी जगह भेज दिया गया। वहाँ दीवार और फर्श तोड़ने का काम था。
"आज फिर एक बात साफ महसूस हुई कि मजदूर का काम पहले से तय नहीं होता। वह जहाँ पहुँचता है, वहीं तय होता है कि आज उससे क्या करवाया जाएगा।"
सुबह से लगातार तोड़फोड़ का काम चलता रहा। हैमर मशीन भी चलाई और छेनी-हथौड़ी भी। ईंट और सीमेंट की धूल इतनी उड़ रही थी कि कई बार आँखों में चली गई। पूरा शरीर लाल धूल से भर गया था। काम करते-करते कब एक बज गया, पता ही नहीं चला。
हम लोग खाना खाने की तैयारी कर ही रहे थे कि मकान मालिक ने कहा पहले एक जगह और तोड़ दो, फिर खाना खा लेना। ठेकेदार भी मान गया। उस समय मुझे फिर लगा कि मजदूर की जिंदगी में पहले काम आता है, उसके बाद खाना। कोई यह नहीं पूछता कि वह सुबह से भूखा है या नहीं。
करीब दो बजे जाकर खाना खाया और लगभग तीन बजे फिर काम पर लग गया। शाम तक मलबा हटाया, तोड़फोड़ की और सफाई की। उसके बाद कमरे पर वापस आ गया。
आज की सबसे बड़ी परेशानी यह रही कि जेब में एक भी रुपया नहीं था। कमरे में सब्जी, प्याज और मिर्च तक खत्म हो चुकी थी। आखिरकार दूसरे से कुछ रुपये उधार लेकर राशन खरीदना पड़ा। फिर रात का खाना बनाया, खाया और अब आराम कर रहा हूँ。
आज फिर यही महसूस हुआ कि मजदूर रोज कमाता जरूर है, लेकिन कई बार ऐसी मजबूरियाँ होती हैं कि दिन के आखिर में उसकी जेब फिर भी खाली रह जाती है。

