कई दिनों के बाद आज मैं फिर अपनी डायरी लिखने बैठा हूँ। इन दिनों डायरी नहीं लिख पाने की वजह सिर्फ व्यस्तता नहीं थी। सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि मेरे फोन का रिचार्ज खत्म हो गया था। मेरे पास खुद रिचार्ज कराने के पैसे नहीं थे, इसलिए दो-चार दिन पहले मैंने एक रिश्तेदार से रिचार्ज करवा लिया। उनसे कहा कि अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं, रुपये मिलेंगे तो वापस कर दूँगा। अब कई दिनों की डायरी एक साथ छूट गई है और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इतने दिनों की बातें एक ही दिन में कैसे पूरी करूँ। इसलिए मैं उन दिनों की रोज की हर छोटी-बड़ी दिनचर्या के बजाय कुछ ऐसी घटनाएँ बता रहा हूँ जो मेरे लिए महत्वपूर्ण रहीं।
इन दिनों मैं वैसे ही रोज काम पर जाता रहा। किसी दिन एक मजदूर होता था, किसी दिन दो, किसी दिन तीन और जरूरत के हिसाब से कभी संख्या थोड़ी ज्यादा भी हो जाती थी। काम जितना होता, मजदूर भी उसी हिसाब से रखे जाते। लेकिन इन दिनों मेरे सामने कई ऐसी घटनाएँ आईं जिनसे मुझे मजदूर की जिंदगी का दूसरा चेहरा देखने को मिला。
काम मिलता है, लेकिन सम्मान हमेशा नहीं मिलता
एक दिन मकान मालिक ने मुझे ऐसी बात का एहसास कराया कि मजदूर चाहे कितनी भी मेहनत कर ले, उसे हर जगह बराबर सम्मान मिलना जरूरी नहीं है।
जहाँ हम काम कर रहे हैं, वहाँ ऊपर स्टाफ के लिए अलग बाथरूम बना हुआ है। दुकान में रहने और काम करने वाले स्टाफ के लिए शौचालय की अलग व्यवस्था है। एक दिन लगभग चार बजे मकान मालिक ने मुझे देखा और पूछा, “बाथरूम गए थे?”
मैंने कहा, “हाँ, गया था।”
उन्होंने तुरंत कहा, “नहीं-नहीं, वहाँ नहीं जाना। सामने पब्लिक टॉयलेट है, वहीं चले जाया करो।”
मैंने उनसे कहा, “सर, पानी मार देते हैं, साफ कर देते हैं, स्मेल नहीं करेगा।”
लेकिन उन्होंने फिर भी साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अब आगे से मजदूर उस बाथरूम का इस्तेमाल नहीं करेंगे और सभी को बता देना कि सामने वाले पब्लिक टॉयलेट में जाएँ।
मैंने उस बाथरूम को गंदा नहीं किया था, फिर भी मुझे वहाँ जाने से रोक दिया गया। उसके बाद हम लोग पब्लिक टॉयलेट में जाने लगे। उस दिन मुझे पहली बार यह बात बहुत साफ महसूस हुई कि मजदूर की मेहनत और मजदूर का सम्मान हमेशा एक ही चीज नहीं होती। मजदूर किसी की दुकान बना सकता है, दीवार तोड़ सकता है, मलबा उठा सकता है, सामान ढो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उसे उसी जगह की हर सुविधा में बराबर जगह मिले।
राजा को दूसरी साइट पर ले जाने की घटना
इन दिनों मेरे चचेरे भतीजे जितेंद्र कुमार के साथ भी एक घटना हुई। उसे लोग उसके असली नाम से ज्यादा राजा या रंगबाज राजा के नाम से जानते हैं। अगर कोई सिर्फ जितेंद्र बोले तो कई लोग तुरंत नहीं समझेंगे कि किसकी बात हो रही है, लेकिन राजा या रंगबाज राजा बोलते ही लोग पहचान जाते हैं। वह इंस्टाग्राम पर रंगबाजी वाले रील और वीडियो भी बनाता है, इसलिए उसका यह नाम चल पड़ा है। स्वभाव से वह सीधा लड़का है और लोग उससे लगाव रखते हैं।
एक दिन वह एक साइट पर गया था। वहाँ का मकान मालिक चाहता था कि राजा वहीं काम करे ताकि काम जल्दी पूरा हो सके, लेकिन ठेकेदार उसे जबरदस्ती दूसरी साइट पर ले गया। राजा वहाँ जाना नहीं चाहता था, क्योंकि वहाँ बहुत ज्यादा मेहनत कराई जाती थी और शाम सात बजे के बाद भी आराम नहीं मिलता था। वहाँ ठेकेदार का एक बड़ा भाई भी था, जो मजदूरों को बहुत परेशान करता था।
उसी साइट पर मंटू नाम का एक मजदूर भी था। उसकी राजा से किसी बात को लेकर बकझक हो गई थी। एक दिन मंटू ने राजा का कॉलर पकड़ लिया था और ठेकेदार का भाई, जो मिस्त्री है, उसने भी पाइप उठा लिया था। वास्तव में उस समय कितना कुछ हुआ, यह मुझे पूरी तरह मालूम नहीं है, लेकिन राजा उस जगह जाने से डरता था。
दो-तीन दिन पहले की एक और बात है। शाम के सात बज चुके थे और राजा ने कहा कि अब वह काम नहीं करेगा, क्योंकि समय पूरा हो चुका है। तब मंटू ने उस पर कस्सी या फावड़ा उठाकर धमकी दी कि काम करो, नहीं तो काट डालूँगा। ऐसी घटनाएँ भी हमारे मजदूर जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। मुझे यह भी समझ नहीं आता कि ठेकेदार को इस बारे में पूरी जानकारी होती है या नहीं, लेकिन राजा के अनुसार ऐसी स्थिति में भी उल्टा उसी को दोष दिया जाता है कि उसे बात करना नहीं आता, यह नहीं आता, वह नहीं आता।
छह दिन से काम की तलाश में बैठा मेरा चचेरा भांजा
मेरा एक चचेरा भांजा (राजेश) लगातार छह दिन से काम की तलाश में बैठा हुआ था। वह मुझसे बार-बार कहता था, “मामा जी, काम लगा दीजिए। मामा जी, काम लगा दीजिए। मैं कई दिनों से बैठा हूँ।”
मैंने कई जगह कोशिश की, लेकिन जहाँ भी फोन किया, जवाब मिला कि काम नहीं है। किसी मजदूर साथी ने कहा कि मैं खुद खाली बैठा हूँ, मेरे लिए ही काम मिल जाए तो देखो। किसी मिस्त्री ने कहा कि मैं खुद खाली बैठा हूँ तो तुम्हारे लेबर को कहाँ लगा पाऊँगा।
तब मुझे लगा कि मजदूर की समस्या सिर्फ यह नहीं है कि उसे कितना काम करना पड़ता है। कई बार समस्या यह भी है कि काम मिले ही नहीं। उस दिन काम नहीं मिला तो भी घर का खर्च बंद नहीं होता। खाना चाहिए, किराया चाहिए, किस्त चाहिए और घर पर भी रुपये चाहिए।
खाने तक के रुपये नहीं रहते
इन दिनों मेरे सामने बार-बार ऐसी स्थिति आई कि खाने तक के रुपये नहीं थे। काम कभी मिला, कभी कम मिला, किसी दिन मजदूरी हाथ में आई तो दूसरे दिन किसी और जरूरत में निकल गई। ऊपर से घर का खर्च अलग है। ऐसे समय में अक्सर यही सवाल रहता है कि मजदूर आखिर करे तो क्या करे।
मैं खुद कहता हूँ कि मजदूर जिंदगी ऐसी ही है। ऊपर से घर का खर्च, यहाँ की जरूरतें और अपनी देनदारियाँ—सब एक साथ चलती हैं।
बहन को मनिहारी की दुकान खोलनी थी
इसी बीच मेरी बहन ने मुझे फोन किया। उसने कहा कि उसे मनिहारी की दुकान खोलनी है और कुछ रुपये चाहिए। उसने कहा कि किसी से लेकर दे दो, बाद में वह वापस कर देगी।
मैंने उसे समझाया कि ब्याज पर पैसा लोगी तो महँगा पड़ेगा। उसने भी कहा कि अगर ब्याज पर लिया तो बहुत भारी पड़ जाएगा। उसने कहा कि कहीं किस्त का इंतजाम हो जाए तो अच्छा रहेगा, ताकि थोड़ा-थोड़ा करके रुपये चुकाने पड़े।
इसी बीच पापा ने मेरे बड़े पापा के लड़के, यानी मेरे चचेरे भाई, से कुछ पैसे माँगने की बात की। मेरे चचेरे भाई ने मुझे फोन किया। उस समय मेरे फोन में रिचार्ज नहीं था, लेकिन दूसरे के हॉटस्पॉट से इंटरनेट चल रहा था, इसलिए उन्होंने व्हाट्सऐप वीडियो कॉल किया।
उन्होंने पूछा, “तुम्हारे पापा पचास हजार रुपये माँग रहे हैं। दूँ या नहीं दूँ?”
मुझे मालूम था कि किस काम के लिए माँग रहे हैं, फिर भी मैंने पूछा, “किस काम के लिए?”
उन्होंने बताया कि मेरी बहन को देना है। पैसा तीन रुपये सैकड़ा के हिसाब से ब्याज पर देने की बात थी।
मैंने कहा, “अभी रुक जाइए। मैं पापा से बात कर लूँगा, उसके बाद सामने आपको बताऊँगा।”
फिर पापा से बात हुई। उन्होंने माना कि हाँ, उन्होंने पैसे माँगे हैं। लेकिन उस समय मेरा चचेरा भाई सामने ही था और मुझे पापा से निजी बात करनी थी, इसलिए मैं खुलकर बात नहीं कर पाया।
मेरी अपनी किस्त और बहन के लिए दूसरा रास्ता
मैं खुद हर चौदह दिन में लगभग 1530 रुपये की किस्त भरता हूँ। मैंने बहन से कहा कि इस गुरुवार को किस्त लेने वाला आएगा, मैं उससे पूछूँगा। गुरुवार को जब वह आया तो मैंने बहन के लिए लोन की बात की।
उसी दौरान उसने मुझे भी एक बड़ा लोन लेने का प्रस्ताव दिया। उसने कहा कि मेरी माँ के नाम पर लगभग 97 हजार रुपये तक का लोन मिल सकता है। मैंने साफ मना कर दिया। मैंने कहा कि मैं पहले से ही लगभग पंद्रह सौ रुपये की किस्त भर रहा हूँ, अगर उससे ज्यादा लोन ले लूँगा तो कहाँ से संभालूँगा।
मैंने उससे पूछा कि अलोली में उसका कोई ब्रांच है क्या, क्योंकि मेरी बहन वहाँ रहती है और वहाँ से लोन लिया जा सकता है क्या। उसने बताया कि ब्रांच तो है, लेकिन वह खुद वहाँ नहीं है। उसने अपने एक दोस्त का नंबर दिया, जो पहले उसके साथ काम करता था और अब उसकी पोस्टिंग अलोली में है।
उसने व्हाट्सऐप पर नंबर भेज दिया। मैंने उस व्यक्ति से बात की और उसी दिन मेरी बहन को 78,600 रुपये का लोन मिल गया। उसमें से 4100 रुपये के आसपास रजिस्ट्रेशन और बीमा के नाम पर काटे गए। बीमा के बारे में बताया गया कि अगर लोन धारक या उसके कमाने वाले व्यक्ति की लोन चुकाते समय मृत्यु हो जाए तो उस स्थिति में लोन की रकम माफ हो सकती है।
बाकी पैसा मेरी बहन को उसके खाते में भेज दिया गया।
लेकिन पैसे मिलने के बाद भी एक नई परेशानी खड़ी हो गई। अब वह पैसा निकालने में समस्या आ रही थी। उस बात की चर्चा आज की डायरी में आगे हुई है।
मेरी मजदूरी और 1400 रुपये का हिसाब
इन दिनों ठेकेदार के भाई के पास मेरी लगभग 1400 रुपये की मजदूरी लगातार बाकी थी। कई दिनों तक फोन करने के बाद आखिर कल जाकर मुझे 1000 रुपये मिले। फिर भी 400 रुपये बाकी रह गए।
मजदूर के लिए चार सौ रुपये छोटी रकम नहीं होती। कई बार यही पैसा राशन, दवा या अगले दिन की जरूरत के काम आ जाता है।
बाँस की सीढ़ी और मेरी जान का सवाल
काम करते हुए मुझे कई बार चोटें लगीं। उनमें से एक घटना सबसे ज्यादा याद है।
मैं सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर रेता से भरा तसला लेकर जा रहा था। ऊपर जाने के लिए बाँस की सीढ़ी थी। मैंने विकास नाम के उस व्यक्ति से, जिसे वहाँ काम की देखभाल के लिए रखा गया है, पहले ही कहा था, “भैया, सीढ़ी पुरानी है, हो सकता है टूट जाए।”
उन्होंने कहा, “नहीं टूटेगा, छोड़ो।”
मैं तसला सिर पर रखकर चढ़ने लगा। जैसे ही एक स्टेप से दूसरे स्टेप पर पैर रखा, बाँस का फट्टा टूट गया। मेरे सिर पर रेता था। मेरा अपना वजन अलग और सिर पर रखे रेते का वजन अलग। विकास ने किसी तरह मुझे संभालने की कोशिश की, लेकिन स्थिति ठीक नहीं थी。
उन्होंने कहा, “नीचे आ जाओ।”
लेकिन मैं नीचे आता कैसे? सिर पर तसला रखा हुआ था और सीढ़ी टूट चुकी थी। मैं धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। आखिर मैंने सोचा कि तसला गिर जाएगा तो कोई दिक्कत नहीं, लेकिन अगर मैं गिर गया तो बहुत बड़ी परेशानी होगी। मेरे पैर में पहले से गाँठ और दर्द था और मैं पहले भी सीढ़ी से फिसल चुका था।
आखिर मैंने तसला ऊपर से ही छोड़ दिया।
तसला गिरते हुए मेरी जेब में रखे मोबाइल पर गिरा। मोबाइल का ग्लास थोड़ा टूट-फूट गया, लेकिन फोन बच गया। तसला मेरे हाथ पर भी लगा और उसमें चोट आई, छाला पड़ा।
बाद में ठेकेदार ने मुझे डाँटा। उसने कहा, “तुम समझदार होकर भी नासमझी कर दिए। जब तुम्हें पहले से पता था कि सीढ़ी सही नहीं है तो फिर चढ़े क्यों? अपनी सुरक्षा पहले करो, काम बाद में हो जाएगा।”
मैंने उसे बताया कि मैं विकास को पहले ही कह चुका था कि सीढ़ी टूट सकती है, लेकिन उसने मुझसे कहा था कि नहीं टूटेगी।
कुछ घंटे बाद जब ठेकेदार के सामने विकास से बात हुई तो विकास ने अपनी बात बदल दी। उसने कहा कि वह तो मुझे पहले ही बता रहा था कि सीढ़ी टूटने वाली है और मत चढ़ो। मुझे लगा कि वह अपने बचाव के लिए अपनी बात बदल रहा है।
लेकिन मैंने आगे कुछ नहीं किया। जिंदगी में कई बार ऐसा होता है कि सामने वाला सही होते हुए भी गलत ठहरा दिया जाता है।
यह बात मैंने अपने घर-परिवार में भी नहीं बताई।
अब 17 अगस्त 2026 की बात
आज मेरी नींद लगभग 6 बजकर 36 मिनट पर खुली। मेरे पास रुपये नहीं थे, इसलिए मैं कोई हरी सब्जी नहीं ला पाया था। मैंने आलू का भुजिया और रोटी बनाई। करीब आठ बजे तक खाना बनकर तैयार हो गया।
इसी बीच बारिश होने लगी। मैं सोचने लगा कि अगर बारिश ज्यादा हुई तो आज काम पर नहीं जाऊँगा और ठेकेदार को बता दूँगा कि बारिश हो रही है। मेरे शरीर में वैसे भी बहुत थकान है। पिछले दिनों काम का बोझ ज्यादा रहा है। छत के नीचे से मलबा उठाना, ऊपर-नीचे करना, ग्राउंड फ्लोर तक बाहर लाना—इन सबके कारण शरीर थक जाता है।
रोज दस-ग्यारह बजे या उसके बाद सोता हूँ और सुबह छह बजे उठ जाता हूँ। अब नींद पूरी नहीं हो रही है। मुझे खुद लगता है कि शरीर में जान कम पड़ रही है। कभी-कभी खाना बनाते-बनाते भी आँखें बंद होने लगती हैं।
इसलिए सोचा था कि अगर बारिश जोरदार हुई तो आज छुट्टी कर लूँगा। लेकिन संयोग से नौ बजे से पहले बारिश रुक गई और मैं काम पर निकल गया।
लेबर चौक के पास दीपक से मुलाकात
रास्ते में लेबर चौक से पहले मुझे अपने चचेरे बहनोई के भाई दीपक मिले। मैंने उनसे पूछा कि लेबर चौक जा रहे हो या कहीं काम लगा हुआ है।
उन्होंने बताया कि काम तो डिसमिस है, लेकिन ठेकेदार ने कहा था कि आ जाना, वहाँ देखेंगे। उन्हें खुद भी उम्मीद नहीं थी कि काम मिल पाएगा।
मैंने कहा, “ठीक है, देखिए अगर लग जाता है तो।”
दीपक लेबर चौक की तरफ चले गए और मैं सीधे अपनी साइट पर निकल गया।
आज मालिक ठीक नौ बजे आया, लेकिन मैं अकेला था
मकान मालिक आज ठीक नौ बजे आ गया। मैं अकेला पहुँचा था। उसने मुझे चाबी दी और मैंने शटर खोला। उसने पूछा, “तुम अकेले आए हो? और कोई नहीं आया?”
मैंने कहा, “कोई नहीं आया है। मैं अकेला आया हूँ। बाबा पीछे से आ रहे होंगे।”
मैंने उसी समय बाबा को फोन किया। उन्होंने कहा कि वह आज नहीं आ पाएँगे। उनके हाथ का जख्म और ज्यादा बढ़ गया है और खून निकल रहा है। उनके घाव की पट्टी रोज लाल हो जाती थी क्योंकि खून निकलता रहता था।
मैंने कहा कि उनके साथ जो मजदूर आता है, राम लखन, उसे भेज दीजिए।
फिर मैंने ठेकेदार को फोन किया। उसने बताया कि वह साइट पर पहुँच गया है। मैंने कहा कि बाबा नहीं आए हैं और मैं अकेला हूँ। मैंने राजा को भेजने की बात की।
ठेकेदार ने कहा, “अगर वह यहाँ से चला जाएगा तो फिर वहाँ काम कौन करेगा?”
मैंने कहा, “फिर मैं अकेले क्या करूँ?”
उसने कहा, “देख लो, अगर कोई है तो बुला लो।”
मैंने कहा कि अगर पहले बताया होता तो मेरे आसपास का एक बंदा बैठा था।
फिर मैंने दीपक को फोन किया। मैंने पूछा, “काम पर चले गए?”
उन्होंने कहा, “नहीं गया हूँ।”
मैंने कहा, “तो मेरे साथ मोटर मार्केट वाली साइट पर आ जाओ। यहीं काम करना है।”
उन्होंने पूछा, “अकेले आऊँ या और आदमी?”
मैंने कहा, “दो आदमी का काम है। मैं एक हूँ, आप एक आ जाओ।”
उन्होंने कहा, “ठीक है, मैं आ रहा हूँ।”
मैं मकान मालिक के पास गया और बताया कि बाबा के हाथ का जख्म बढ़ गया है, इसलिए वह नहीं आएँगे और दूसरा मजदूर बुलाया है। मकान मालिक ने कहा कि एक नहीं, दो मजदूर बुला लो, मलबा निकालने का काम भी हो जाएगा।
मैंने दीपक को कहा कि एक और आदमी ले आइए।
पुरन ने मना किया, फिर सनोज का नाम आया
दीपक ने अपने भाई पुरन को बुलाने की बात की। लेकिन पुरन ने साफ मना कर दिया। उसका कहना था, “मैं उस ठेकेदार के साथ नहीं जाऊँगा। पहले काम कर चुका हूँ। रुपया सही टाइम पर नहीं देता।”
पुरन के पुराने अनुभव के कारण वह तैयार नहीं हुआ।
दीपक ने कहा, “सनोज भाई बैठे हुए हैं, उनको ले लीजिए।”
सनोज पुरन के साले हैं। उम्र में बड़े होने के कारण पुरन उन्हें “सनोज भाई” कहता है।
मैंने कहा, “ठीक है, किसी को भी लेकर आ जाइए।”
दीपक पहले मेरे पास आया। मकान मालिक ने कहा था कि आप अंदर काम करो, जिसका नंबर है दे दो, मैं उसे अंदर ले आऊँगा। मैंने दीपक का नंबर दिया और रास्ता भी समझाया।
दीपक अंदर आया तो उसने पूछा, “सनोज को फोन किए थे?”
मैंने कहा, “नहीं।”
उसने कहा कि पीछे से सनोज को भी फोन कर दीजिए। मैंने सनोज को फोन किया, रास्ता समझाया और फोन रख दिया।
इसी बीच दीपक ने पूछा, “मुझे पेशाब करने जाना है, टॉयलेट कहाँ है?”
मैंने कहा, “बगल में ही पब्लिक टॉयलेट है, वहाँ चले जाओ।”
उन्होंने कहा, “ठीक है। मैं बाहर जाता हूँ और सनोज को भी अंदर ले आऊँगा।”
कुछ देर बाद दोनों अंदर आ गए।
मकान मालिक आया और उसने कहा कि दोनों को काम समझा दो।
मैंने दोनों को काम बताया और साथ ही चेतावनी दी, “भाई, दुकान में जो भी सामान रखा है, उसमें से एक भी सामान को मत छूना या लेकर मत जाना।”
दोनों ने कहा, “ठीक है, नहीं ले जाएँगे।”
मैंने मकान मालिक से भी कहा, “सर, टेंशन मत लीजिए। दोनों अपने आदमी हैं। एक भी सामान इधर-उधर नहीं होगा, चोरी नहीं होगी।”
मकान मालिक ने कहा, “ठीक है। जब तुम्हारा अपना बंदा है तो कोई दिक्कत नहीं।”
फिर हम सब काम करने लगे।
मिस्त्री और ठेकेदार आए
कुछ देर बाद मिस्त्री आया और उसके बाद ठेकेदार आया। मिस्त्री अपना काम करता रहा।
लंच से पहले ठेकेदार ने कहा कि बगल में भंडारा चल रहा है, आप लोग उसमें खा लेना। मैंने कहा, “हम सब खाना लेकर आए हैं, कैसे जाएँगे?”
उसने कहा, “भंडारा है तो प्रसाद खा लेना।”
मैंने कहा, “ठीक है, चले जाएँगे।”
फिर हम काम करने लगे।
मसाला और चार भारी गार्डर
काम करते-करते मसाला बनाने की बारी आई। मैंने सनोज भाई से कहा, “आप मसाला बना दो।”
उन्होंने रेता और बजरी नापना शुरू किया।
फिर सीमेंट लाने की बारी मेरी थी। मैं सीमेंट लेने ऊपर गया तो देखा कि टेमटम से फिर वही लोहे के गार्डर आए हैं, जैसे पहले भी आए थे। पहले दस गार्डर दो टेमटम में आए थे, लेकिन आज चार आए थे।
मैंने गार्डर लाने वाले व्यक्ति से पूछा, “उस्ताद, एक गार्डर का वजन कितना होगा?”
उन्होंने बताया, “एक का वजन ढाई क्विंटल है।”
मैंने कहा, “यानी चारों मिलाकर कुल दस क्विंटल?”
उन्होंने कहा, “हाँ।”
यह सुनते ही मेरे मन में आया कि एक अकेला घोड़ा इतना भारी वजन खींचकर लेकर आया है। उसे कितना कष्ट हुआ होगा।
घोड़े की हालत देखकर मन खराब हो गया
मैंने घोड़े को ध्यान से देखा। उसके शरीर के अलग-अलग हिस्सों में पट्टियाँ बंधी हुई थीं।
गर्दन की तरफ पट्टी इस तरह बंधी थी कि वह आगे खींच सके। पीछे पीठ, पिछवाड़े और पूँछ की तरफ भी पट्टी जैसी व्यवस्था थी, ताकि अगर ज्यादा ढलान पड़े और घोड़ा रुक जाए तो टमटम भी उसके साथ रुक सके। नीचे पेट की तरफ से भी कुछ बँधा था, ताकि टमटम पीछे से उठ न जाए और घोड़ा तथा गाड़ी संतुलन में रहे।
पीठ की तरफ की व्यवस्था इस तरह थी कि जो वजन आ रहा था, उसे भी घोड़ा संभालता रहे। पीछे पहिए थे, लेकिन खींचने का मुख्य काम उसी घोड़े का था。
धूप भी बहुत थी और घोड़ा बहुत बुरी हालत में था। वह बिल्कुल वैसे हाँफ रहा था जैसे कुत्ता हाँफता है।
मैंने सोचा कि आखिर वह कितना कष्ट सहकर यह सामान खींच रहा होगा।
लेकिन हम कर भी क्या सकते थे? घोड़ा हमारा नहीं था। मैं बस उसकी हालत देख सकता था।
इतना जरूर कहूँगा—वह घोड़ा बहुत कष्ट में था।
गार्डर उतारने में मजदूर लगे
मकान मालिक का बेटा/भतीजा वहाँ खड़ा था। उसने कहा, “और लोगों को साथी को बुला लीजिए या गाड़ी उतार लीजिए।”
मैंने कहा, “हम मजदूर लोग ही उतार लेंगे।”
उसने कहा, “ठीक है, आइए थोड़ी मदद करवाइए।”
पहले दो गार्डर एक तरफ थे। मैं, समर भाई और गार्डर लाने वाला लड़का, हम तीनों ने मिलकर दोनों गार्डर पलट दिए। फिर घोड़े को दूसरी तरफ से घुमाकर बाकी गार्डर भी उतारे।
इस काम में लगभग एक घंटा निकल गया।
उसके बाद मैं पेशाब करने गया और वापस आया तो खाना खाने का समय हो चुका था।
लंगर में पुआ और खीर
समर भाई पूछ रहे थे कि मसाले में पानी डालने के लिए पानी कहाँ से लेंगे। मैंने कहा, “अभी पानी मत डालिए। लंच का टाइम हो चुका है। मसाला बैठ जाएगा।”
फिर हम लंगर खाने चले गए।
मैं, दीपक, सलूम भाई और गोरेलाल मिस्त्री—हम चार लोग साथ गए।
दीपक को पहले से पता था कि लंगर लगा हुआ है, लेकिन वह दूसरी जगह का लंगर देख चुका था। जब मैं उस जगह पहुँचा जहाँ मुझे लंगर के बारे में पता था तो वहाँ देखकर लगा कि शायद खत्म हो गया है।
दीपक ने कहा, “मैं यहाँ वाला नहीं बोल रहा था। मैंने दूसरी जगह देखा था।”
मैंने कहा, “यहाँ तो कई दिन से पोस्टर लगा हुआ है कि 17 तारीख को लंगर होगा।”
आखिर हम लोगों ने वहीं खाना खाया। खाने में पुआ और खीर थी। उसी समय मैंने देखा कि ठेकेदार भी वहाँ बैठकर खा रहा था।
हम चार मजदूर/मिस्त्री भी वही खाना खा रहे थे।
खाने के बाद लगभग 1 बजकर 19 मिनट पर हम अपनी साइट की ओर वापस चल दिए। वहाँ पहुँचकर कुछ देर आराम किया और फिर दो बजे काम पर लग गए।
दीवार काटने वाली मशीन और उसका ₹5,000 का किराया
आज एक दीवार काटने वाली मशीन भी लाई गई थी ताकि पूरी दीवार को एक साथ काटकर गिराया जा सके। लेकिन मशीन ठीक से काम नहीं कर पाई।
मशीन चलाने वाला व्यक्ति मशीन के किराए की बात कर रहा था। उसने बताया कि उसका किराया 5000 रुपये प्रतिदिन है और वह खुद भी इस किराए को काफी ज्यादा बता रहा था। उसने दूसरी मशीनों के किराए से तुलना भी की, लेकिन मैंने उसमें कुछ नहीं कहा।
गार्डर वाला भी वहीं था।
बिजली चली गई
करीब दस बजे तक बिजली चली गई और पूरा अंधेरा हो गया।
हम लोग तोड़-फोड़ का काम कर रहे थे, इसलिए बिजली का असर कुछ कम था, लेकिन अंधेरे में गर्मी बहुत ज्यादा लग रही थी। पहले से खरीदी हुई इमरजेंसी लाइट हमें दी गई थी और उसी के सहारे काम चलता रहा।
कुछ देर बाद मलबा डालने का काम भी हुआ।
मकान मालिक ने कहा कि पहले दीवार का काम जल्दी करवाओ ताकि गार्डर लगाया जा सके। इसलिए मैंने फिर दीवार तोड़ना शुरू रखा।
लगभग बारह बजे चाय भी आई थी。
धीरे-धीरे मजदूरों का हिस्सा पूरा होता गया
सनोज का दीवार तोड़ने वाला काम पूरा हो गया। उसके बाद वह मिस्त्री के साथ मसाला बनाने के काम में लग गया।
दीपक का काम थोड़ा बाद तक चला। तीन बजे के बाद उसका भी दीवार तोड़ने का काम पूरा हो गया。
लगभग चार बजे दीपक मलबा फेंकने गया और मैं दीवार तोड़ता रहा।
इस दौरान मकान मालिक एक-दो बार आया और बोला, “यार, आज इसको जल्दी निपटा दो। छह बजे तक भी काम करो। नीचे तक कर दो ताकि गार्डर लग सके।”
मैंने कहा, “कोशिश कर रहा हूँ, आज पूरा हो पाएगा या नहीं, उम्मीद नहीं है।”
उन्होंने कहा कि बड़े हथौड़े, यानी तीन-चार किलो वाले घन से काम करो।
मैंने कहा, “सर, पूरी दीवार नहीं तोड़नी है। मुझे सिर्फ दो-तीन ईंटें निकालनी हैं। इतने बड़े हथौड़े से काम करना ठीक नहीं होगा।”
इसके बाद मकान मालिक ने दीपक को भी फोन किया और कहा कि जो पुराना मजदूर दीवार तोड़ रहा है, सभी मजदूरों को उसके साथ लगा दो ताकि काम जल्दी पूरा हो।
पुराना मजदूर मैं ही था।
मैंने सोचा कि दो-तीन ईंटें निकालने के लिए सभी मजदूर कैसे लगेंगे? ऊपर से ईंट तोड़ेंगे तो नीचे खड़े मजदूर के सिर पर लग सकती है।
मैंने मजाक में कहा कि सभी मजदूर लगा देंगे, लेकिन ऊपर वाला ईंट तोड़ेगा, नीचे वाले के सिर पर ईंट गिरेगी, उसके नीचे वाला फिर उससे नीचे वाले के सिर पर ईंट गिराएगा।
दीपक ने भी मजाक में कहा कि ऐसा करते हैं कि एक आदमी ईंट तोड़ेगा, दूसरा उसे रोक लेगा और तीसरा उसमें लगा मसाला रोक लेगा।
हम हँसे, लेकिन खतरा तो खतरा ही था।
कुछ देर बाद मकान मालिक के भतीजे देवराज आए। उन्होंने कहा, “यार, सभी मिलकर इसको तोड़ लो।”
मैंने कहा, “सर, सिर्फ दो ईंटें तोड़नी हैं। ऊपर से तोड़ेंगे तो नीचे वाले मजदूर के सिर पर लग सकती हैं।”
उन्होंने कहा कि किसी तरह जल्दी करो।
मैंने कहा, “मैं अकेले ही इस दीवार को तोड़ लूँगा।”
उन्होंने कहा, “ऊपर तोड़ो लेकिन नीचे क्या होगा?”
मैंने काम जारी रखा।
गर्मी, अंधेरा और शाम की छुट्टी
करीब पाँच बजे के बाद चाय आई। बिजली अभी तक नहीं थी। अंदर गर्मी से हालत खराब थी और इमरजेंसी लाइट की बैटरी भी धीरे-धीरे कम हो रही थी।
आखिर साढ़े पाँच बज गए और हम लोगों ने छुट्टी कर दी।
दो मजदूरों को ₹800-₹800 और ठेकेदार का ₹100
मैंने दीपक से कहा कि मकान मालिक को फोन करो। सुबह मकान मालिक ने कहा था कि अगर ठेकेदार मजदूरों को रुपया नहीं देगा तो वह खुद देगा。
दीपक ने फोन किया और कहा कि अब हम लोग जा रहे हैं, इसलिए रुपये चाहिए।
मकान मालिक ने फोन करके अपने बेटे को दोनों मजदूरों को पैसा देने के लिए कहा।
हमने पूछा कि जो पुराना मजदूर पहले से काम कर रहा है, उसे मिलेगा या नए मजदूरों को। मुझे कहा गया कि नए मजदूरों को दिया जाएगा।
मैंने कहा, “सर, मुझे नहीं, इन दोनों को दे दीजिए।”
दोनों को 800-800 रुपये मिले, कुल 1600 रुपये।
हम लोगों को ठेकेदार 700 रुपये देता है जबकि मकान मालिक से 800 रुपये लेता है। यानी प्रति मजदूर 100 रुपये का अंतर उसके पास रहता है।
हम यह जानते हैं, लेकिन क्या करें? अगर मैं ठेकेदार के खिलाफ बोल दूँ या सौ रुपये के लिए विवाद कर दूँ तो आगे वह मुझे काम देगा या नहीं, पता नहीं। वह किसी दूसरी साइट पर भी कह सकता है कि इस आदमी को काम मत देना।
मजदूर के पास काम खोने का डर हमेशा रहता है, इसलिए लोग कई बातें सहकर चुप रहते हैं।
ओवरटाइम के लिए दीपक वापस चला गया
दीपक ने अंदर बताया था कि ठेकेदार ने उसे कहा था कि काम खत्म होने के बाद फोन करना, ओवरटाइम के लिए आना।
इसलिए दीपक ओवरटाइम करने वापस चला गया।
गोरेलाल मिस्त्री अपने कमरे की तरफ चला गया।
सनोज भाई ने मुझसे पूछा कि मेरा पैसा दिया गया या नहीं।
मैंने कहा, “मैं मकान मालिक से पैसा नहीं लेता। मैं ठेकेदार से पैसा लेता हूँ। मकान मालिक मुझे नहीं देगा, वह ठेकेदार को देगा और ठेकेदार मुझे देगा।”
फिर हम अपने-अपने रास्ते चल दिए।
किराए की बात
इसी बीच सुबह मकान मालिक ने दूसरे किरायेदार के नंबर पर फोन करके मुझसे बात की थी।
उन्होंने पूछा, “अपने मकान मालिक को पहचानते हो? नाम जानते हो?”
मैंने कहा कि वह पंजाबी हैं, लेकिन उनका नाम ठीक से याद नहीं है। उन्होंने पंजाबी में कुछ कहा भी था, लेकिन मुझे वह याद नहीं रहा।
फिर उन्होंने पूछा, “रुपया कब दोगे, रेंट का?”
मैंने कहा, “देखिए, पहले जो यहाँ रहता था, वह अभी घर गया हुआ है और अभी आया नहीं है। इसलिए मैं मकान मालिक को ठीक से नहीं पहचानता।”
उन्होंने पूछा कौन है।
मैंने बताया कि मेरे पापा यहाँ रहते थे और वे घर गए हुए हैं।
उन्होंने कहा कि पापा का नंबर दो।
मैंने कहा, “पापा का नंबर लेकर क्या करेंगे? रुपये मैं खुद दूँगा। जब मैं रह रहा हूँ तो किराया मैं दूँगा।”
उन्होंने पूछा कि कब दूँगा।
मैंने कहा, “एक-दो दिन में।”
उन्होंने कहा, “ठीक है, अपने नंबर से फोन करो।”
मैंने फोन किया। उन्होंने कहा, “ठीक है, फोन आ गया।”
उसके बाद मैंने फोन रख दिया।
उधर काम वाली जगह पर मैंने ठेकेदार से भी पैसे माँगे थे। उसने कहा था कि दे देगा, लेकिन शाम तक मुझे पैसा नहीं मिला।
कमरे पर पानी की समस्या
रूम पर आने के बाद मेरी नजर पानी की टंकी पर गई।
पानी बहुत कम था और आज पानी आया भी नहीं था।
पहले मैंने सोचा कि बोतल में रखा हुआ पानी बाल्टी में पलटकर कपड़े धो लूँ। लेकिन फिर मैंने सोचा कि अगर अभी पानी आया नहीं है तो क्या पता रात तक भी न आए। अगर मैंने बोतल का पानी भी खत्म कर दिया तो पीने के लिए क्या होगा?
इसलिए मैंने बोतल वाला पानी बचा लिया।
टंकी में जो थोड़ा पानी था, उसी से कपड़ा साफ किया।
उसी समय एक दूसरा किरायेदार बाहर से आया और उसने भी कपड़े धोना शुरू कर दिया। कपड़े धोते-धोते टंकी का पानी लगभग बिल्कुल खत्म हो गया।
अब मुझे नहाने की परेशानी हुई।
किसी तरह नल से आधी बाल्टी के आसपास पानी निकाला। बहुत देर बाद बाल्टी भर पाई।
मैं ठीक से नहा भी नहीं सका। न साबुन लगाया, न शैंपू। बस पानी शरीर पर डालकर किसी तरह नहा लिया।
मैं सोच रहा था कि अगर अभी किसी को टॉयलेट जाना पड़ जाए तो? एक बाल्टी पानी तक नहीं है। अगर किसी को तुरंत पानी चाहिए तो भी कहाँ से आएगा?
अगर मैंने अपनी बोतल का पानी कपड़े धोने में इस्तेमाल कर लिया होता तो शायद अभी पीने के लिए एक बूंद पानी भी नहीं बचता।
तब मुझे लगा कि गरीबी का मतलब सिर्फ जेब में पैसा न होना नहीं है। कई बार पानी जैसी बुनियादी चीज भी संकट बन जाती है।
लौटते समय बारिश और मोबाइल बचाने की कोशिश
काम से लौटते समय जब मैं लेबर चौक तक पहुँचा तो थोड़ी-थोड़ी बारिश शुरू हो गई।
मैंने संजय भाई से कहा, “जल्दी स्पीड में अपने रूम चले जाइए।”
मैं भी अपने कमरे की तरफ चल दिया।
कुछ आगे जाकर बहुत जोरदार बारिश शुरू हो गई। मैं कुछ सेकंड के लिए एक पेड़ के नीचे रुका। मेरे पास पॉलीथिन नहीं था। मैंने मोबाइल को गमछे में लपेट लिया और फिर दौड़ते हुए कमरे की ओर आया। गमछा पूरी तरह भीग गया, लेकिन मोबाइल नहीं भीगा।
उसी जगह एक महिला स्कूटी पर बारिश में फँसी थीं। मैंने उनसे कहा, “मैडम जी, वहाँ छत के नीचे जो थोड़ा बाहर निकला हुआ हिस्सा है, वहाँ जाकर खड़ी हो जाइए, बारिश से बच जाएँगी।”
उन्होंने कहा कि वह वहाँ चली जातीं, लेकिन आगे बिल्ली रास्ता काट गई है, इसलिए आगे नहीं जा पा रही हैं।
मैंने कहा, “आप आ जाइए, मैं आपके आगे चला जाता हूँ। कोई दिक्कत नहीं होगी।”
फिर भी वह आगे नहीं बढ़ीं। जब दूसरा बाइक वाला आगे बढ़ा, तब उन्होंने भी आगे जाना शुरू किया। तब तक वह बारिश में भीगती रहीं।
मैं दौड़ते हुए अपने कमरे पर आया।
राजेश को ₹500 देना
कमरे पर आने के बाद मेरे चचेरे भांजे राजेश का फोन आया।
उसने पूछा, “मामा जी, कहाँ हो?”
मैंने कहा, “रूम पर।”
उसने बताया कि उसे राशन लाने के लिए 500 रुपये चाहिए।
मैं उसकी हालत समझ गया। वह छह दिन से लगातार बैठा हुआ था और उसके पास पैसे नहीं थे।
कल ही मुझे ठेकेदार के भाई से 1000 रुपये मिले थे। मेरा मन था कि वह पैसा पुराने उधार में दे दूँ, लेकिन अब राजेश के सामने जरूरत थी।
मैंने उसे 500 रुपये दे दिए。
अब जिस व्यक्ति से मैंने उधार लिया था, उसे समय पर नहीं दे पाऊँगा। जब राजेश पैसा लौटाएगा, तब अपना उधार चुका पाऊँगा।
मेरी टूटी हुई चप्पल
मेरी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि मैं अभी टूटी हुई चप्पल पहन रहा हूँ। ढलाई में सरिया बाँधने के लिए जिस तार का इस्तेमाल होता है, उसी तार से मैंने अपनी चप्पल बाँध रखी है।
नई चप्पल लेने के लिए भी पैसे सोचकर खर्च करने पड़ते हैं।
दवाइयाँ भी साइट पर छूट गईं
आज मेरी घाव पर लगाने वाली दवा और चोट पर लगाने वाली दूसरी दवा भी साइट पर छूट गई। मैं रोज उन्हें साथ लेकर जाता हूँ और शाम को लगाता हूँ।
आज भूल गया।
घाव पर जो सूखा हुआ हिस्सा जमा था, वह अब भर गया है और घाव में पानी जैसा लग रहा है। वैसे भी रोज धूल-मिट्टी चले जाती है, इसलिए उससे पानी जैसा निकलता रहता है।
आज रात क्या लगाऊँगा, यह मुझे नहीं पता।
बहन के खाते में पहुँचे पैसे और KYC की समस्या
आज मेरी भाभी ने फिर फोन किया। उन्होंने बताया कि जो लोन लिया गया था, उसका पैसा उनके खाते में भेज दिया गया है लेकिन उनके ससुराल में पैसा निकालते समय KYC माँगी जा रही है।
उन्होंने पूछा, “क्या मैं आपके घर आऊँ तो वहाँ पैसा निकल जाएगा?”
मैंने कहा, “यह मैं नहीं बता सकता। बैंक वाले ही बताएँगे।”
उन्होंने कहा कि वहाँ KYC माँग रहा है। मैंने कहा कि ज्यादा दिनों तक पैसे निकालने पर KYC तो माँग सकता है। हमारे खाते में अभी तक ऐसी दिक्कत जल्दी नहीं आई है, रुपये आते-जाते रहते हैं।
फिर उन्होंने एक सुधीर नाम के बैंक वाले व्यक्ति के बारे में पूछा, लेकिन सीधे नाम नहीं लिया। इसका कारण रिश्तेदारी की मर्यादा थी। मेरे बहनोई के मामा का नाम भी सुधीर है और हमारे यहाँ पति के मामा का नाम सीधे नहीं लिया जाता। इसलिए उन्होंने इशारे में कहा कि मिथलेश नाम के आदमी के भाई से पूछ लेते हैं।
मैं समझ गया कि वह सुधीर की बात कर रही हैं।
मैंने कहा कि वह तो सिर्फ कैशियर के रूप में है। अंतिम रूप से बैंक का वही कर्मचारी बताएगा जो रुपये निकालने की प्रक्रिया करेगा। उसका नंबर मेरे पास नहीं है और बैंक जाकर ही पता चलेगा कि पैसा निकलेगा या नहीं।
हमने कहा कि कोशिश करेंगे।
इसी बीच मैंने यह भी सोचा कि अगर जरूरत पड़ी तो एक ही दिन में महेशखूंट से रुपये लेकर घर जाऊँ, फिलहाल वहाँ न रहूँ और घर पर या आसपास ही काम देखूँ।
17 अगस्त से पहले की एक अलग घटना: सिकंदर, छाता और आईटी पार्क का काम
अब एक बात साफ कर दूँ। यह घटना 17 अगस्त की उसी दिन की दिनचर्या नहीं है। यह उससे पहले की घटना है, जो आज अपनी बाकी बातों के बीच मुझे याद आई।
उस दिन मेरे मोबाइल का रिचार्ज खत्म होने वाला था और मैं छाता लेकर काम पर जा रहा था। मेरे पास अपना छाता था।
लेबर चौक के पास मेरी मुलाकात सिकंदर से हुई, जिसके साथ मैं पहले काम कर चुका हूँ। हमने हाल-चाल पूछा। उसने पूछा कि कहाँ काम कर रहे हो। मैंने बताया कि मोटर मार्केट में।
वहीं एक दूसरा व्यक्ति खड़ा था। वह एक अस्थायी किस्म की दुकान/नाई की दुकान के पास था। उसने मुझसे कहा, “रुकिए, मुझे भी लेकर चलिए।”
हम दोनों एक ही छाते के नीचे आगे जाने लगे।
रास्ते में उस व्यक्ति ने मुझसे पूछा, “कोई पढ़ा-लिखा बंदा तुम्हारी नजर में है?”
मैंने पूछा, “क्या काम है?”
उसने बताया कि आईटी पार्क में कंप्यूटर का काम है।
मैंने कहा, “पढ़ा-लिखा तो मैं खुद हूँ। मैंने बीए पूरा किया है।”
उसने कहा, “ठीक है, तो आप ही आ जाओ।”
मैंने पूछा, “सैलरी कितना देगा?”
उसने बताया कि 26 दिन का काम होगा और 18 हजार रुपये मिलेंगे।
मैंने पूछा, “कितना घंटा?”
उसने कहा, “आठ घंटा।”
फिर शिफ्ट की बात हुई। A शिफ्ट सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक, B शिफ्ट दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक और C शिफ्ट रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक।
मैं पहले कंपनी में काम कर चुका हूँ, इसलिए शिफ्ट की यह व्यवस्था मुझे समझ में आती है।
बाद में उस व्यक्ति ने रास्ते में और फोन करके भी पूछा कि मैंने तय किया या नहीं। उसने कहा कि एक दिन तुमसे नंबर लिया था और आईटी पार्क में कंप्यूटर का काम करने की बात कही थी, क्या हुआ, करोगे या नहीं?
मैंने कहा कि मेरे फोन में रिचार्ज नहीं था और ठीक से बात नहीं कर पाया, इसलिए जवाब नहीं दे पाया।
उसने पूछा, “कब बताओगे?”
मैंने कहा, “आज शाम में बता दूँगा।”
लेकिन मैंने उसे अब तक जवाब नहीं दिया।
मैंने यह नौकरी इसलिए तुरंत स्वीकार नहीं की क्योंकि मैं उस आदमी को पहली बार मिला था। मुझे नहीं पता था कि वह सच में नौकरी दिलवाएगा या नहीं, काम करने के बाद पेमेंट मिलेगा या नहीं, मेरे साथ कोई गड़बड़ी या धोखाधड़ी होगी या नहीं।
मेरे लिए 18 हजार रुपये की नौकरी का प्रस्ताव बड़ा था, लेकिन केवल रास्ते में हुई पहली मुलाकात के भरोसे पर अपना काम छोड़ देना भी मेरे लिए आसान नहीं था। मैं पहले घर-परिवार से बात करना चाहता था।
उसी दिन की दूसरी घटना: गोरेलाल देर से आए और मेरी मेहनत की तारीफ हुई
जिस दिन मुझे उस आदमी से आईटी पार्क वाले काम की बात हुई थी, उसी दिन गोरेलाल मिस्त्री करीब 12 बजे काम पर आए। बारिश की वजह से उन्हें देर हुई थी।
मकान मालिक ठेकेदार से नाराज था। ठेकेदार उसका फोन नहीं उठा रहा था। वह बार-बार मुझे कह रहा था—
“तुम फोन करो भाई।”
मैंने कहा, “सर, आप ही फोन करके पूछ लीजिए कि क्या करवाना है।”
उन्होंने कहा, “अब मैं फोन नहीं करूँगा। ठेकेदार फोन नहीं उठा रहा है। अपने आपको बहुत बड़ा आदमी समझ रहा है।”
फिर उन्होंने मुझसे फोन करवाया।
मैंने ठेकेदार से पूछा कि वह आएगा या नहीं। उसने कहा, “हाँ, आएँगे।”
मकान मालिक ने फिर कहा कि मिस्त्री आएगा या नहीं, यह पूछो। मैंने वह भी पूछा। ठेकेदार ने कहा कि मिस्त्री से अभी बात नहीं हो पाई है।
आखिर मिस्त्री को बुलाया गया और वह करीब 12 बजे पहुँचे।
उन्होंने बताया कि बारिश के कारण देर हो गई थी और ठेकेदार ने कहा तो वह आ गए।
उस दिन मकान मालिक ठेकेदार से बहुत नाराज था। वह कह रहा था कि ऐसा काम नहीं चलता। मिस्त्री लेट आया, ठेकेदार फोन नहीं उठा रहा, काम की व्यवस्था सही नहीं है।
लेकिन इसी बातचीत के दौरान मकान मालिक ने मेरे बारे में एक अच्छी बात कही।
उसने कहा कि मैं काम करने में “हीरा” हूँ, मेहनत करके काम करता हूँ और परिश्रमी हूँ।
मकान मालिक का भतीजा भी पहले सबके सामने मेरे बारे में कह चुका था कि यह लड़का बहुत अच्छा है, मेहनती है और मन लगाकर काम करता है।
मैंने बाद में गोरेलाल मिस्त्री और बाबा को भी यह बात बताई।
मैंने कहा कि एक तरफ कुछ लोग मेरे बारे में कहते हैं कि मैं अच्छा नहीं हूँ, लेकिन जिस मकान मालिक के यहाँ मैं काम करता हूँ, वही मेरी मेहनत की तारीफ कर रहा है。
अगर मैं अच्छा लड़का नहीं होता और मन लगाकर काम नहीं करता, तो मकान मालिक खुद मेरी तारीफ क्यों करता?
भाई के साले का रिश्ता भी अटक गया
इन दिनों मेरे भाई के साले का एक रिश्ता भी मैं लगा रहा था।
उसे लड़की बहुत पसंद है। वह मुझे बार-बार फोन करता था—
“यार, यह रिश्ता फाइनल करवा दो।”
मैंने लड़की की माँ से बात की।
उन्होंने कहा कि अभी आप यहाँ नहीं हैं, लड़का भी यहाँ नहीं है और लड़की के पिता का भी निधन हो चुका है। उन्होंने कहा कि उनके देवर छठ के समय घर आएँगे और तभी वे इस रिश्ते के बारे में आगे बात कर पाएँगी।
लड़की के पिता की मृत्यु को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए उनकी बरखी भी नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि अभी शादी नहीं हो पाएगी।
मैंने कहा कि कम से कम हाँ या ना तो बता दीजिए, ताकि मैं बात वहीं खत्म कर दूँ या आगे बढ़ाऊँ।
मुझे लगा कि अभी लड़की का परिवार तैयार नहीं है। मैंने अपने भाई के साले से कहा कि अभी शादी नहीं होगी, क्योंकि तुम यहाँ नहीं हो, लड़की की तरफ से भी कोई यहाँ नहीं है और मैं भी यहाँ नहीं हूँ।
लड़की की माँ ने साफ कहा कि जब तक मैं खुद वहाँ नहीं जाऊँगा, वह रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाएँगी, क्योंकि मैं लड़के की तरफ से अगुआ बनकर रिश्ता लगा रहा हूँ और वह लड़के को खुद नहीं पहचानती हैं।
उसके बाद से मेरे भाई के साले ने मुझे फोन करना भी बंद कर दिया।
जितेंद्र से ज्यादा “राजा” की पहचान
इन सारी बातों के बीच मेरे चचेरे भतीजे जितेंद्र की पहचान भी अपने नाम से ज्यादा उसके उपनाम से है।
अगर कोई पूछे कि जितेंद्र कौन है, तो कई लोग शायद तुरंत न समझें। लेकिन “राजा” या “रंगबाज राजा” बोलो तो लोग तुरंत पहचान जाते हैं।
वह दिल का सीधा लड़का है। लोगों के साथ मिलकर रहता है, इसलिए लोग उससे लगाव रखते हैं।
शायद यही वजह है कि उसके असली नाम से ज्यादा उसका यह नाम चल गया है।
दिन खत्म होने से पहले एक और बात
जब हम लोग साइट से बाहर आ रहे थे तो रास्ते में मकान मालिक से बात हुई। उन्होंने दीपक के मोबाइल पर फोन किया और पूछा कि रुपये मिल गए या नहीं।
दीपक ने कहा, “हाँ, मिल गया।”
उन्होंने पूछा कि मिस्त्री कहाँ गया। बताया गया कि मिस्त्री अपने कमरे की तरफ चला गया है।
फिर मकान मालिक ने मेरे बारे में पूछा कि वहाँ जो पुराना मजदूर था, क्या वह तुम्हारे साथ है। दीपक ने कहा, “हाँ, साथ ही है, बात कर लीजिए।”
मकान मालिक ने मुझसे बात की।
उन्होंने बताया कि जिन दोनों मजदूरों को मैंने बुलाया था, उन्हें उनका पैसा मिल चुका है। उन्होंने मुझे इसलिए बताया क्योंकि उन दोनों को बुलाने में मेरी भूमिका थी।
दीपक ने पूछा, “कल आना है?”
मकान मालिक ने कहा, “नहीं, कल नहीं आना है तुम लोगों को।”
फिर जब मुझसे बात हुई तो उन्होंने कहा, “तुम अकेले आ जाना। कल अकेले का ही काम है।”
मैंने कहा, “ठीक है, कोई दिक्कत नहीं। अकेले आ जाएँगे।”
हमने फोन रख दिया।
आज की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मेरे सामने अभी भी वही पुराने सवाल खड़े हैं—कल कितना काम मिलेगा, कौन साथ होगा, मजदूरी कब मिलेगी, घर पर कितना पैसा भेज पाऊँगा और जो पैसा कमाऊँगा, वह मेरे पास कितनी देर टिकेगा।
साइट पर मेरी दवा छूट गई है। मेरे घाव पर जो सूखी परत जमा हुई थी, वह अब भर गई है और घाव में पानी जैसा लग रहा है। रोज धूल-मिट्टी जाने के कारण उससे पानी निकलता रहता है। आज रात क्या लगाऊँगा, मुझे नहीं पता।
मेरी चप्पल टूटी हुई है, जिसे मैंने सरिया बाँधने वाले तार से बाँधकर पहन रखा है। कमरे में पानी की टंकी लगभग खाली है। बहन के लोन का पैसा बैंक से निकालने की परेशानी सामने है। मेरे चचेरे भांजे को राशन के लिए 500 रुपये दे चुका हूँ, इसलिए जिस उधार को चुकाना था वह फिर रुक गया है।
फिर भी सुबह होने पर मुझे उठना है。
क्योंकि काम चाहे पक्का हो या न हो, मजदूर के लिए अगली सुबह का इंतजार करना और फिर काम की तलाश में निकल जाना, दोनों उसकी जिंदगी का हिस्सा हैं।
आज की डायरी यहीं खत्म करता हूँ।

