आज सुबह मेरी नींद 6 बजे के बाद खुली। उठते ही मैंने सबसे पहले कमरे में झाड़ू लगाया, नित्यक्रिया से निपटा और फिर खाना बनाने की तैयारी में लग गया। आज मैं रोज़ की तुलना में जल्दी उठ गया था, इसलिए खाना भी जल्दी बन गया। करीब 7:30 बजे तक खाना तैयार हो चुका था。
खाना बनाने के बाद मैंने ब्रश किया और करीब 8 बजे खाना खाने बैठ गया। आज खाना जल्दी बन गया था, इसलिए करीब 8:30 बजे तक मैं खाना खाकर तैयार भी हो गया।
इसी दौरान मेरे कमरे का दरवाजा एक महिला ने खटखटाया। पहले मुझे लगा कि शायद मकान मालिक रूम रेंट लेने आए होंगे। लेकिन दरवाजा खोलकर देखा तो बिल्डिंग में रहने वाली एक महिला थीं। उन्होंने बताया कि बाहर प्रसाद बंट रहा है और सभी कमरों में रहने वालों को प्रसाद लेने के लिए बुलाया जा रहा है。
मैंने उनसे कहा, "अभी तो खाना खा रहा हूँ और हाथ जूठे हैं। हाथ धोकर प्रसाद ले आता हूँ।"
हाथ धोकर नीचे गया तो वहाँ प्रसाद लेने वालों की भीड़ थी। प्रसाद में केला, सेब, पानी की छोटी बोतल, मैंगो जूस और एक अन्य फल दिया जा रहा था, जिसका नाम मुझे याद नहीं है। मैं खाली हाथ गया था, इसलिए मुझे दो केले, एक सेब, एक छोटी पानी की बोतल और एक मैंगो जूस मिला。
प्रसाद लेकर कमरे में आया। खाना खाने के बाद एक केला और सेब खाया और दूसरा केला टिफिन में रख लिया। फिर खाना पैक किया और काम के लिए आशाबरी की तरफ निकल पड़ा。
लेबर चौक पर पुराने परिचितों से मुलाकात
जब मैं लेबर चौक पहुँचा तो वहाँ मेरे चचेरे बहनोई पुरन के भाई दीपक से मुलाकात हुई। आज उनके पास भी काम नहीं था। कल जिन मजदूर साथी दुलारचंद का मैंने जिक्र किया था, उनसे भी मुलाकात हो गई। वहाँ सनोज नाम के एक मिस्त्री भी मिले。
दुलारचंद और सनोज मुंगेर जिले के रहने वाले हैं। मेरे चचेरे बहनोई के भाई दीपक मेरे ही ससुराल की तरफ, भागलपुर जिले के अठेगामा से हैं。
दुलारचंद और सनोज ने मुझसे कहा,
"यार, कहीं मिस्त्री का काम लगाओ।"
मैंने कहा, "जहाँ मैं काम कर रहा हूँ, वहाँ तोड़-फोड़ के काम में अभी मिस्त्री का काम ही नहीं है।"
उन्होंने कहा, "मिस्त्री का नहीं तो कम से कम लेबर का ही काम लगवा दो।"
मैंने उन्हें बताया कि मेरा अपना काम भी रोज़-रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ रहा है और पता नहीं कब बंद हो जाए। वहाँ काम है, लेकिन बड़ा काम दिवाली के बाद शुरू होगा। अभी काम शुरू कर दिया गया तो दिवाली तक पूरा नहीं हो पाएगा। बिल्डिंग में काम बहुत ज्यादा है और दिवाली से पहले ग्राहक खरीदारी करने आएँगे। अगर उसी समय तोड़-फोड़, मशीनों का शोर और चारों तरफ मलबा पड़ा रहेगा तो ग्राहकों को परेशानी होगी। इसलिए फिलहाल थोड़ा-बहुत काम हो रहा है और बड़ा काम बाद में शुरू होगा。
राजा रंगबाज का इंतजार
इसके बाद मैंने अपने चचेरे भतीजे जितेंद्र उर्फ राजा रंगबाज को फोन किया। मैंने पूछा, "कहाँ हो?"
उसने कहा, "अभी रूम पर हूँ, बस आ रहा हूँ। रास्ते में एक गिलास मौसमी का जूस पियूँगा और आ जाऊँगा।"
मैंने कहा, "ठीक है, जल्दी आओ। मैं लेबर चौक पर खड़ा हूँ।"
मैं काफी देर तक इंतजार करता रहा, लेकिन वह नहीं आया। करीब 9 बजने लगे तो मैंने फिर फोन किया। उसने बताया कि वह अभी जूस की दुकान पर है。
मैंने कहा, "ठीक है, तुम जूस पीकर आओ, मैं आगे जा रहा हूँ।"
अब देर हो चुकी थी, इसलिए मैं वहाँ से अपने काम की तरफ चल पड़ा。
लेबर चौक का एक ऐसा मिस्त्री, जिसके पास कोई मजदूर नहीं जाना चाहता
लेबर चौक पर खड़े-खड़े मैंने एक दिलचस्प बात भी देखी। एक व्यक्ति मजदूर खोजने आया था, लेकिन कोई भी मजदूर उसके साथ जाने को तैयार नहीं था。
बाद में मुझे पता चला कि वह व्यक्ति खुद मिस्त्री था और उसका बेटा भी मिस्त्री था। यानी बाप-बेटा दोनों मिस्त्री थे और उनके साथ एक ही लेबर काम करता था। मजदूरों के बीच उसकी ऐसी छवि बनी हुई थी कि जो मजदूर एक दिन उसके साथ चला जाता, वह दोबारा उसके साथ जाने का नाम नहीं लेता। चाहे काम एक मंजिल पर हो, दो मंजिल पर या तीन मंजिल पर—दो मिस्त्रियों के साथ सिर्फ एक मजदूर रखा जाता था। मजदूर काम करते-करते इतना थक जाता कि फिर कोई उसके पास जाना नहीं चाहता था。
मैं कुछ देर वहाँ खड़ा रहा, लेकिन कोई मजदूर उसके साथ नहीं गया। आखिर मैं भी अपने काम की तरफ निकल गया。
आज पहली बार पता चला—बाबा के साथ आने वाले मजदूर का नाम राम लखन है
काम वाली जगह पहुँचा तो बाबा के साथ आने वाला मजदूर साथी भी आ चुका था। वह उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले का रहने वाला है। इतने दिनों से साथ काम कर रहा था, लेकिन आज तक मैंने उसका नाम नहीं पूछा था。
काम करते-करते मैंने उससे पूछा,
"भाई, आपका नाम क्या है? इतने दिन से काम कर रहे हो और आज तक नाम ही नहीं पूछा।"
उसने बताया—राम लखन。
नाम सुनकर मुझे अच्छा लगा। राम और लखन—दोनों नाम एक साथ जुड़े हुए हैं。
सौरभ भी काम पर आ गया था, लेकिन आज भी वह खाना लेकर नहीं आया था。
घोड़े पर लदे भारी लोहे के चैनल
आज काम वाली बिल्डिंग में एक और चीज आई, जिसने मेरा ध्यान खींच लिया। दो टेमटम पर लंबे और भारी लोहे के चैनल लाए गए थे। ये चैनल छत को सहारा देने के लिए लगाए जाने थे。
हर टेमटम पर लगभग पाँच चैनल थे। यानी दोनों टेमटम मिलाकर करीब दस चैनल। चैनल इतने लंबे और भारी थे कि उन्हें उतारने में कई लोगों को लगना पड़ा। मेरा अनुमान था कि कुल वजन 200 से 300 क्विंटल के आसपास होगा, हालांकि सही वजन मुझे पता नहीं है。
लेकिन इन चैनलों को देखकर मेरे मन में एक अलग ही विचार आया। इन्हें लाने के लिए घोड़े को कितनी ताकत लगानी पड़ी होगी? इतना भारी सामान खींचते समय उस घोड़े को कितनी परेशानी हुई होगी, यह तो वही घोड़ा जानता होगा。
सौरभ ने जब एक चैनल उठाने की कोशिश की तो उससे वह हिला तक नहीं। वजन ही इतना था कि अकेले आदमी के लिए उसे हिलाना आसान नहीं था。
काम क्या करना है—यह भी तय नहीं था
कुछ देर बाद मकान मालिक और उनका भतीजा आए। मकान मालिक ने मुझे चाबी दी और मैंने शटर खोला。
उन्होंने हमसे पूछा, "आज क्या काम करोगे?"
मैंने बताया, "आज दूसरी तरफ की दीवार तोड़नी है।"
उन्होंने कहा, "ठीक है, अपना काम करो।"
हम लोग दीवार तोड़ने की तैयारी करने लगे। तभी बिल्डिंग की देखरेख करने वाले पुराने स्टाफ विकास भाई ने आकर कहा,
"आप लोगों को बाबू बुला रहे हैं।"
हम लोग उनके पास गए。
उन्होंने कहा, "अभी दीवार तोड़ने का काम बंद कर दो। जब तक ठेकेदार विनोद नहीं आते, तब तक दीवार मत तोड़ना। वह आएँगे और बताएँगे कि कहाँ और कैसे तोड़ना है।"
मैंने कहा, "ठीक है। तब तक हम लोग मलबा ही बाहर फेंक देते हैं।"
उन्होंने कहा, "ठीक है।"
हम लोग मलबा बाहर फेंकने लगे。
गोरेलाल आज नहीं आए
कुछ देर बाद हमारे ठेकेदार विनोद आए। उन्होंने बताया कि आज गोरेलाल मिस्त्री काम पर नहीं आएँगे। गोरेलाल उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। ठेकेदार ने बताया कि रात में उन्होंने कुछ ज्यादा नशा कर लिया था, इसलिए आज काम पर नहीं आ पाए। उनकी पत्नी ने भी ठेकेदार को फोन किया था। उनकी बातचीत से यही पता चला कि घर में भी इस वजह से परेशानी चल रही है。
लेकिन इसके बाद ठेकेदार ने एक और फैसला सुनाया। उन्होंने कहा,
"दीवार तोड़ने का काम अभी बंद कर दो। मैं अपने सिर पर इसकी जिम्मेदारी नहीं ले सकता। अगर इंजीनियर कल आया और उसने पूछा कि बिना पूछे दीवार कैसे तोड़वा दी, और आगे चलकर बिल्डिंग में कोई अनहोनी हो गई तो जिम्मेदारी किसकी होगी? मैं इसका रिस्क नहीं ले सकता।"
हमने पूछा, "तो फिर हम लोग क्या करें?"
मैंने कहा,
"अगर पहले बता देते कि आज दीवार नहीं तोड़नी है, तो हम लोग सुबह लेबर चौक पर ही कोई दूसरा काम देख लेते। अब तो दस बज चुके हैं।"
लेकिन अब हमारे पास कोई दूसरा काम खोजने का समय भी नहीं बचा था。
काम नहीं तो मजदूर को वापस
हम चार लोग वहाँ से बाहर निकलने लगे—मैं, राम लखन, सौरभ और जितेंद्र उर्फ राजा रंगबाज। गोरेलाल मिस्त्री आज हमारे साथ थे ही नहीं। हमने ठेकेदार के औजार—छेनी, हथौड़ा आदि—एक थैले में रख लिए。
बाहर आने पर मकान मालिक ने पूछा,
"काम नहीं करोगे?"
ठेकेदार ने समझाया कि इंजीनियर की अनुमति के बिना दीवार तोड़ने की जिम्मेदारी वह नहीं ले सकता। मकान मालिक के भतीजे ने कहा कि कुछ तो काम करवाओ。
फिर थोड़ी बातचीत के बाद तय हुआ कि कम से कम मलबा हटाने और छत को सहारा देने के लिए जैक लगाने का काम किया जा सकता है। जैक भी खराब था और उसे बदलकर दूसरा जैक लाना था。
इसी बीच एक स्टाफ ने मजाक में कहा,
"काम नहीं है तो कम से कम दुकान के सामने गड्ढा ही कर दो।"
ठेकेदार ने भी मजाकिया अंदाज में कहा,
"यहाँ नहीं। बोलो तो मेन गेट के सामने ही गड्ढा कर देते हैं!"
थोड़ी देर हँसी-मजाक के बाद तय हुआ कि मैं और राम लखन रुकेंगे। जितेंद्र उर्फ राजा रंगबाज और सौरभ वापस चले गए。
यह मेरे लिए आज का एक बड़ा अनुभव था—अगर काम नहीं है, तो मजदूर को काम वाली जगह से वापस भी भेज दिया जाता है。
सौरभ का खाना और गमछा
सौरभ आज फिर बिना खाना लाए आया था। कल ठेकेदार ने उसे 200 रुपये भी दिए थे, लेकिन फिर भी वह खाना लेकर नहीं आया। वह गमछा भी नहीं लाता और दूसरे मजदूरों के गमछे से काम चला लेता है。
आज हमने तय किया कि रोज-रोज किसी का खाना और गमछा देना भी संभव नहीं है। इसलिए आज हमने न उसे खाना दिया और न गमछा。
सात जैक लेकर निकलना
इसके बाद मैं और राम लखन मलबा फेंकने में लग गए। ऊपर से मलबा नीचे बेसमेंट में लाया जा रहा था। इसी बीच मलबा उठाने वाली गाड़ी आ गई और मलबा लोड होने लगा। फिर एक ई-रिक्शा आया। उस पर सात जैक लादे गए। जैक को रस्सी से अच्छी तरह बाँधा गया ताकि रास्ते में गिर न जाए。
मैं और विकास भाई उन जैकों को बदलवाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में फौजी ढाबा के पास से होते हुए, राजा रंगबाज के कमरे के पास से और फिर अपने कमरे के आसपास से गुजरते हुए हम आगे बढ़े। HDFC बैंक के पास शोरूम वाली जगह से कुछ पहले निर्गंकारी आर.के. सैटिंग सप्लायर के पास पहुँचे। वहाँ जैक उतारे गए。
लेकिन जिस जैक को बदलना था, उसके बदले जो सामान मिला, वह भी हमारे हिसाब से सही नहीं था। वह लोहे के खूँटे जैसा था और आकार में काफी बड़ा था। मैंने कहा कि अगर थोड़ा छोटा होता तो धीरे-धीरे टाइट करके काम चला सकते थे, लेकिन यह भी सही आकार का नहीं है。
बाद में ठेकेदार भी वहाँ पहुँचे। काफी बातचीत हुई। आखिर तय हुआ कि सही जैक दूसरी तरफ से आएगा और उसके किराए के रूप में लगभग ₹550 देने की बात हुई。
मैं और विकास भाई लौटते समय बात कर रहे थे。
मैंने कहा, "यार, ₹550 किराया थोड़ा ज्यादा नहीं है?"
विकास भाई ने भी माना कि रकम ज्यादा है, लेकिन हमारे पास उस समय बहुत ज्यादा विकल्प नहीं था。
रास्ते में ई-रिक्शा की दो सवारियाँ
वापस आते समय दो महिलाएँ ई-रिक्शा को रोककर पूछने लगीं कि किसनगढ़ जाना है। हमारा ई-रिक्शा उस तरफ नहीं जा रहा था, इसलिए उन्हें बैठाया नहीं गया。
थोड़ा आगे दो और महिलाएँ मिलीं। उन्होंने मुथूट फाइनेंस के पास जाने को कहा। वह जगह हमारे रास्ते में ही थी, इसलिए हमने उन्हें बैठा लिया。
उनमें से एक महिला ने ई-रिक्शा पर रखा थैला देखकर पूछा, "इसमें क्या रखा है?"
मैंने बताया, "लोहे के जैक हैं। सीट फट न जाए, इसलिए उसके ऊपर कट्टा बिछा दिया है।"
उन्होंने कहा, "इस पर पैर रख सकते हैं?"
मैंने कहा, "हाँ, रख लीजिए। इसमें कोई ऐसी चीज नहीं है।"
फौजी ढाबा के पास मुथूट फाइनेंस के नजदीक उन्हें उतारकर हम वापस काम वाली जगह की तरफ चल पड़े। तब तक बारिश शुरू हो चुकी थी। हमारी इस पूरी यात्रा में लगभग एक घंटा निकल गया और जब मैं वापस पहुँचा तो समय करीब 11:50 बजे हो चुका था。
बारिश में भी रेत अंदर करनी पड़ी
वापस पहुँचकर बारिश में भीगते हुए मैं और राम लखन रेत अंदर करने लगे। मन में लगातार एक ही सवाल था—जैक आएगा भी या नहीं? अगर जैक नहीं आया तो आज आधे दिन में ही छुट्टी करनी पड़ेगी。
मैंने इस बारे में विकास भाई से भी चर्चा की। आखिर एक बज गया और हम लोग खाना खाने बैठ गए। खाना खाते समय करीब 1:17 बजे चाय आई। स्टाफ चाय लेकर आया था。
मैंने उससे पूछा, "आप चाय पिएँगे या खाना खाएँगे?"
उसने कहा, "क्या कर सकते हैं यार, दुकान पर ज्यादा लड़के हैं और आज मैं अकेला पड़ गया हूँ। इसलिए थोड़ी देर हो गई चाय लाने में।"
मैंने कहा, "कोई बात नहीं, रख दीजिए। बाद में पी लेंगे।"
खाना खाते-खाते मैंने चाय भी पी और राम लखन ने भी खाना खाने के बाद चाय पी。
पहली बार काम वाली जगह पर नींद लगी
खाना खाने के बाद हम लोग थोड़ा आराम करने लगे। मन में अभी भी यही था कि अगर दो बजे तक जैक आ गया तो उसे लगाकर छत को सहारा देंगे और फिर दीवार तोड़ने का काम शुरू हो सकता है。
करीब 1:50 बजे मेरी आँख लग गई। आज पहली बार ऐसा हुआ कि काम वाली जगह पर ही मुझे नींद आ गई। करीब 2:13 बजे आँख खुली。
मैं विकास भाई से पूछने ही जा रहा था, "जैक आया या नहीं? अगर नहीं आएगा तो हम लोग कमरे पर चले जाएँ।"
तभी देखा कि जैक वाली गाड़ी आ चुकी थी。
एक स्टाफ ने भी आवाज लगाई, "भाई, जैक आ गया। उतार लो।"
मेरी चिंता थोड़ी कम हुई。
सातों जैक उतारे गए। गाड़ी ठेले जैसी थी और आगे मोटरसाइकिल लगी हुई थी। जैक लाने वाले ने बताया कि वह रास्ता भटक गया था और दूसरी जगह चला गया था। वहाँ पता चला कि सामान दूसरी तरफ है, फिर वह सही जगह खोजते हुए यहाँ पहुँचा。
हमने कहा, "कोई बात नहीं।"
अगर जैक नहीं आता तो शायद हम लोग वापस कमरे पर चले जाते。
सात जैक और पूरी दोपहर की मेहनत
मैं और राम लखन सातों जैक अंदर लेकर गए और उन्हें लगाने का काम शुरू किया। एक-एक करके जैक को सही जगह पर लगाया और टाइट किया गया। छत को सहारा देने के लिए बल्लियों और लोहे के सहारे को मजबूत किया गया। काम करते-करते करीब पाँच बजे का समय हो गया。
बाद में लगभग साढ़े पाँच बजे चाय आई। तब तक मकान मालिक का भतीजा भी आ चुका था और मकान मालिक का बेटा भी वहाँ बैठा था। वे केदार को भी लेकर आए थे。
उन्होंने पूछा, "अब क्या दीवार तोड़ सकते हैं?"
तभी उन्होंने देखा कि जैक अच्छी तरह टाइट हो चुके हैं और उनका लोड लोहे के सहारे पर आ चुका है। ठेकेदार ने बताया कि अब सहारा तैयार है और लोड जैक पर आ गया है। इसके बाद दीवार हटाने का काम किया जा सकता है。
सुबह जो लोहे के चैनल आए थे, वे भी अब ऊपर लगाए जाने थे। आज की तस्वीरों में यही काम साफ दिखाई देता है—छत को सहारा देने के लिए जैक और बल्लियों को टाइट किया गया था。
शाम को फिर वही सवाल—कल काम होगा या नहीं?
करीब 5:29 बजे हम लोग वहाँ से निकलने लगे。
मैंने विकास भाई से कहा, "ठीक है विकास भाई, अब मैं जा रहा हूँ।"
जाते-जाते मैंने मकान मालिक के बेटे से पूछा, "सर, कल आना है या नहीं?"
उन्होंने कहा, "मैं नहीं बता सकता। अपने ठेकेदार से बात कर लेना।"
मैंने कहा, "ठीक है, मैं ठेकेदार से बात कर लूँगा।"
राम लखन ने भी कहा कि आप मेरा नंबर ले लीजिए और ठेकेदार से बात करने के बाद मुझे बता दीजिएगा। मैंने उसका नंबर ले लिया。
मन में फिर वही सवाल था—कल काम होगा भी या नहीं? ठेकेदार से मैंने खाना बनाते समय फोन पर बात की। मैंने पूछा कि कल साइट पर आना है या नहीं। उन्होंने कहा कि कल काम नहीं चलेगा。
लेकिन मेरे मन में पूरी तरह भरोसा नहीं था। आज भी पहले काम करने को कहा गया और बाद में काम रुकवा दिया गया था। इसलिए मन में यही था कि कल भी पता नहीं क्या हो。
संतोष सिंह से मुलाकात की उम्मीद
काम से निकलने के बाद मैंने रास्ते में संतोष सिंह को फोन किया। कल उनसे बात हुई थी और उन्होंने मेरे कमरे पर आने की बात कही थी। फोन नहीं उठा। कमरे पर पहुँचकर फिर फोन किया। इस बार उनसे बात हुई。
मैंने पूछा, "अंकल जी, आज आएँगे क्या?"
उन्होंने बताया कि अभी काम पर हैं। उन्होंने कहा कि पहले अपने कमरे पर जाकर पूछेंगे कि वहाँ से आने की अनुमति मिलेगी या नहीं। अगर वहाँ से अनुमति नहीं मिली तो मेरे कमरे पर आ जाएँगे。
मैंने कहा, "अगर आप आने वाले हैं तो मैं आपके लिए खाना बनाकर रखूँगा।"
उन्होंने कहा, "आप अपने लिए खाना बना लो। अगर मैं आया तो वहाँ से खाना खाकर आऊँगा।"
मैंने कहा, "ठीक है।"
मंगलवार का प्रसाद और पूजा
कमरे पर आने के बाद मैंने कपड़े साफ किए और नहाया। आज मंगलवार था, इसलिए बाजार गया। वहाँ से प्रसाद, चावल और हरी सब्जी लेकर आया। कमरे पर आकर पूजा की और आसपास रहने वाले लोगों को भी प्रसाद दिया。
रास्ते में मेरे बड़े पापा के दामाद और मेरे चचेरे बहनोई नीरज से भी मुलाकात हुई। उनका घर खगड़िया जिले के नारायणपुर क्षेत्र के लुधेला गाँव में है। वह भी मजदूरी करते हैं। उस समय वह राशन लेकर आ रहे थे। थोड़ी देर हाल-चाल पूछा और फिर मैं अपना सामान लेकर कमरे पर आ गया。
आज रात के खाने में मैंने चावल, कढ़ी और कचरी बनाई। अभी खाना खाने से पहले एक और जरूरी बात थी。
रिश्ते की बात भी आगे बढ़ी
मैंने अपने बड़े भाई के साले से भी बात की। उनकी शादी के लिए मैं एक लड़की से बातचीत आगे बढ़ा रहा हूँ। मैंने उन्हें लड़की की तस्वीर भेजी। उन्हें लड़की पसंद आई। उन्होंने कहा कि बात आगे बढ़ाई जा सकती है。
एक मजदूर की जिंदगी में जहाँ एक तरफ दिनभर छत संभालने के लिए जैक लगाना और दीवार तोड़ने की चिंता होती है, वहीं दूसरी तरफ परिवार में रिश्ते और शादी की बातें भी चलती रहती हैं。
और शाम को जितेंद्र का फोन नहीं आया
करीब सात बजने वाला था, लेकिन मेरा चचेरा भतीजा जितेंद्र उर्फ राजा रंगबाज अभी तक घर नहीं पहुँचा था। उसकी माँ ने मुझे फोन करके पूछा, "काम से नहीं आए हो क्या?"
मैंने कहा, "मैं तो काम से आ चुका हूँ। जितेंद्र नहीं आया क्या?"
उन्होंने कहा, "नहीं आया।"
मैंने बताया, "वह दूसरी साइट पर है, इसलिए अभी नहीं आया होगा।"
आज एक मजदूर साथी छुट्टी पर था और काम की अनिश्चितता के कारण दिनभर यही पता नहीं था कि काम चलेगा या बंद होगा。
आज की तस्वीरों में दर्ज एक और कहानी
आज जो तस्वीरें मैंने खींचीं, उनमें एक तरफ घोड़े की गाड़ी पर लाए गए लंबे और भारी लोहे के चैनल दिखाई दे रहे हैं। दूसरी तस्वीर में वही चैनल सड़क किनारे रखे हुए हैं। तीसरी तस्वीर में एक और घोड़ा-गाड़ी दिखाई दे रही है。
इन तस्वीरों को देखकर मेरे मन में फिर वही सवाल आया—हम इंसान अपनी जरूरत के लिए कितना वजन दूसरे जीवों से ढुलवाते हैं?
और दूसरी तरफ मेरी काम वाली जगह की तस्वीर है, जहाँ छत को गिरने से रोकने के लिए जैक और बल्लियों को टाइट किया गया। सुबह जिस दीवार को तोड़ना था, वह सुरक्षा की चिंता के कारण रुक गई। फिर पूरा दिन इसी इंतजार में बीता कि सही जैक आएगा या नहीं。
आखिर जैक आया, हमने उसे लगाया और शाम तक छत को सहारा देने का काम पूरा किया。
लेकिन दिन खत्म होते-होते फिर वही अनिश्चितता सामने खड़ी थी—कल काम होगा या नहीं, यह अभी भी तय नहीं था。
मजदूर की जिंदगी शायद ऐसी ही है—सुबह घर से निकलते समय पता नहीं होता कि आज काम मिलेगा या नहीं, काम मिलने के बाद पता नहीं होता कि पूरा दिन काम चलेगा या नहीं, और शाम को लौटते समय पता नहीं होता कि अगली सुबह उसी जगह वापस जाना होगा या नहीं।

