28 मार्च 2025 को मैंने ई-रिक्शा खरीदा।
ई-रिक्शा की कुल कीमत ₹1,81,000 थी। मेरे पास इतना पैसा नहीं था। गाँव में ही किसी से ₹71,000 कर्ज लेकर ई-रिक्शा खरीदा और बाकी ₹1,10,000 फाइनेंस पर बंधवाया गया। फाइनेंस की मासिक किस्त ₹7,499 बनी।
गाँव से लिए गए ₹71,000 कर्ज पर ब्याज ₹3 सैकड़ा था। इसका मतलब यह था कि हर महीने ब्याज का दबाव अलग से था और फाइनेंस की किस्त अलग से।
जब ई-रिक्शा घर आया था, तब मुझे लगा था कि अब मजदूरी की मजबूरी कम हो जाएगी। मुझे लगा था कि अब रोज़ यह नहीं सोचना पड़ेगा कि आज काम मिला या नहीं, आज धूप ज्यादा है इसलिए काम पर नहीं जा पाए, आज मजदूरी कम मिल रही है इसलिए जाना ठीक नहीं है। ई-रिक्शा मुझे अपना रोजगार लग रहा था।
लेकिन सरकारी सब्सिडी समय पर नहीं मिली।
मुझे बताया गया था कि ई-रिक्शा खरीदने पर सरकार से ₹70,000 की सहायता मिलेगी। इसी भरोसे मैंने कर्ज लिया। लेकिन सब्सिडी आने में करीब 10 महीने लग गए। इस बीच कर्ज का ब्याज बढ़ता गया, किस्त का दबाव बढ़ता गया और घर का खर्च अलग से था।
सब्सिडी पाने के लिए कई बार भाग-दौड़ करनी पड़ी। सरकारी दफ्तरों और प्रक्रिया के चक्कर में एक गरीब आदमी की हालत कैसी होती है, यह मैंने खुद महसूस किया। जिस मदद को गरीब आदमी की सहायता कहा जाता है, वही मदद अगर समय पर न मिले तो वही मदद बोझ बन जाती है।
और यही मेरे साथ हुआ।
जिस ई-रिक्शा को मैंने मजदूरी से छुटकारे की उम्मीद में खरीदा था, उसी ई-रिक्शा के कर्ज और किस्त ने मुझे फिर बाहर जाकर मजदूरी करने पर मजबूर किया। जब मैं परदेश कमाने गया, तब ई-रिक्शा कभी घर पर खड़ा रहता था, कभी कोई दूसरा चला देता था और कई बार बिल्कुल बंद पड़ा रहता था।
यह कहानी सिर्फ ई-रिक्शा खरीदने की कहानी नहीं है।
यह कहानी है कि गरीब आदमी सरकारी योजना पर भरोसा करता है, फिर पहले कर्ज लेता है, फिर ब्याज भरता है, फिर फाइलों के पीछे दौड़ता है, फिर भी समय पर राहत नहीं मिलती। सहायता देर से मिलती है, लेकिन कर्ज समय पर दबाता है।
इस कहानी का डेटा
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| ई-रिक्शा खरीदने की तारीख | 28 मार्च 2025 |
| कुल कीमत | ₹1,81,000 |
| गाँव से लिया गया कर्ज | ₹71,000 |
| ब्याज | ₹3 सैकड़ा |
| फाइनेंस राशि | ₹1,10,000 |
| मासिक किस्त | ₹7,499 |
| सरकारी सब्सिडी | ₹70,000 |
| सब्सिडी मिलने में देरी | लगभग 10 महीने |
| असर | कर्ज और किस्त के दबाव में परदेश मजदूरी |
मेरी बात
अगर सब्सिडी समय पर मिल जाती, तो शायद मुझे बाहर मजदूरी करने नहीं जाना पड़ता। ई-रिक्शा से अच्छी कमाई नहीं हो पा रही थी, ऊपर से किस्त और कर्ज का दबाव था। घर वाले भी सोचने लगे थे कि शायद ई-रिक्शा लेना गलती हो गई।
आज ई-रिक्शा मेरे पास है, लेकिन वह नई वाली स्थिति में नहीं है। उम्मीद अभी भी है, लेकिन अब मैं समझता हूँ कि सिर्फ वाहन खरीद लेना रोजगार नहीं बनाता। रोजगार तब बनता है जब योजना, समय, कमाई और व्यवस्था — सब गरीब आदमी के पक्ष में काम करें।

