आज का दिन आम के बगीचे में बीता।
सुबह से हाथ में बाँस की लग्गी थी। पेड़ पर आम लगे थे और हमें उन्हें गिराना था। ऊपर देखकर आम पहचानना, लग्गी को सही जगह फँसाना, आम को तोड़कर नीचे गिराना, फिर उन्हें इकट्ठा करना, कैरेट में भरना — बाहर से देखने में यह काम आसान लग सकता है, लेकिन पूरा दिन यही करते रहो तो शरीर जवाब देने लगता है।
मजदूरी में शरीर सबसे पहले बोलता है।
हाथ दुखता है, कंधा भारी होता है, गर्दन ऊपर देखते-देखते थक जाती है। धूप हो तो पसीना अलग, जमीन गीली हो तो फिसलने का डर अलग। काम करते समय कोई यह नहीं पूछता कि शरीर कितना चल पा रहा है। मजदूर के लिए सवाल बस इतना होता है — काम पूरा हुआ या नहीं?
शाम में जब आदमी घर लौटता है, तब उसके पास बहुत बड़े विचार करने की ताकत नहीं बचती। उसे खाना चाहिए, थोड़ा आराम चाहिए और नींद चाहिए। यही मजदूरी का सच है।
लेकिन अब मैं एक नई बात सीख रहा हूँ।
मैं सोच रहा हूँ कि मजदूरी सिर्फ कमाई नहीं है, यह भी एक दस्तावेज़ है। एक मजदूर का दिन भी लिखा जाना चाहिए। कौन-सा काम था, कितने घंटे लगा, कितनी कमाई हुई, शरीर में कहाँ दर्द हुआ, किस बात पर गुस्सा आया, किस बात पर चुप रहना पड़ा — ये सब बातें अगर नहीं लिखी जाएँगी तो कौन जानेगा कि एक मजदूर की जिंदगी कैसे चलती है?
आज मैंने सोचा कि आम का बगीचा भी एक किताब है।
पेड़ पर आम दिखता है, लेकिन उसके पीछे मजदूर का हाथ नहीं दिखता। बाजार में आम बिकता है, लेकिन उसे तोड़ने वाले का नाम नहीं दिखता। खाने वाले को फल का स्वाद मिलता है, लेकिन मजदूर के कंधे की थकान कोई नहीं पढ़ता।
यही वह जगह है जहाँ से मेरी डायरी शुरू होती है।
मैं बड़ा लेखक नहीं हूँ। मैं बस लिखना सीख रहा हूँ कि मेरे दिन में क्या हुआ। अगर आज मैंने आम तोड़ा, तो यह भी दर्ज होगा। अगर कल मैंने ई-रिक्शा चलाया, तो वह भी दर्ज होगा। अगर परसों सड़क का गड्ढा देखा, तो वह भी दर्ज होगा।
क्योंकि जो जिंदगी रोज़ मेहनत में गुजरती है, वही सबसे कम लिखी जाती है।
आज की फील्ड नोट
| सवाल | जवाब |
|---|---|
| काम | आम के बगीचे में मजदूरी |
| औजार | बाँस की लग्गी, कैरेट |
| शरीर की थकान | हाथ, कंधा, गर्दन |
| सोच | मजदूर का दिन भी दस्तावेज़ है |
| कहानी का बिंदु | फल दिखता है, मजदूर नहीं |

