दुनिया में क्या हो रहा है, यह खबर में आता है।

कहीं युद्ध है, कहीं चुनाव है, कहीं तेल महंगा है, कहीं मजदूरों का संकट है, कहीं किसी देश की अर्थव्यवस्था हिल रही है।

पहले मुझे लगता था कि ये सब चीजें बहुत दूर की हैं। मेरे गाँव, मेरी मजदूरी, मेरे ई-रिक्शा और मेरे घर के खर्च से इनका क्या संबंध?

लेकिन धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि दुनिया की बड़ी बातें छोटे आदमी के घर तक पहुँचती हैं।

अगर तेल महंगा होता है, तो सामान महंगा होता है।
अगर बाजार बदलता है, तो मजदूरी पर असर आता है।
अगर किसी देश में युद्ध होता है, तो उसकी चर्चा यहाँ तक पहुँचती है।
अगर सरकारें बदलती हैं, तो नीतियाँ बदलती हैं।
अगर दुनिया में काम का तरीका बदलता है, तो गाँव का नौजवान भी उससे प्रभावित होता है।

मैं दुनिया का विशेषज्ञ नहीं हूँ।
लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि दुनिया की बड़ी खबरों का असर मेरे जैसे आदमी पर कैसे पड़ता है।

मेरे लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मतलब सिर्फ नक्शे पर देश देखना नहीं है। मेरे लिए सवाल यह है कि दुनिया में जो कुछ बदल रहा है, उसमें मेहनत करने वाले आदमी की जगह कहाँ है?

क्या दुनिया का विकास मजदूर को साथ लेकर चल रहा है?
क्या मशीनें और तकनीक गरीब आदमी को ऊपर उठा रही हैं या और पीछे कर रही हैं?
क्या बड़े देशों की लड़ाई में छोटे लोगों की जिंदगी महंगी होती जा रही है?
क्या रोजगार, पलायन और महंगाई को दुनिया की खबरों से अलग करके देखा जा सकता है?

मैं इन सवालों को सीखते हुए लिखूँगा।

हो सकता है मेरी समझ शुरू में कम हो। लेकिन मेरी कोशिश यह रहेगी कि बड़ी खबरों को जमीन से जोड़कर देखूँ। टीवी की तेज आवाज़ से अलग, एक मेहनतकश नागरिक की धीमी लेकिन सच्ची समझ से देखूँ।

क्योंकि दुनिया की खबरें चाहे जितनी बड़ी हों, उनका बोझ आखिर में आम आदमी की थाली, जेब, मजदूरी और रोज़गार तक आता है।

यह मेरी दुनिया-दृष्टि की शुरुआत है।