मैं राजनीति का बड़ा विशेषज्ञ नहीं हूँ। मैं टीवी डिबेट वाला आदमी नहीं हूँ।
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| राजनीति कोई टीवी डिबेट नहीं है; यह उस आदमी की भी होती है जो रोज़ ई-रिक्शा चलाता है और इन टूटी सड़कों पर अपनी ज़िंदगी गुज़ारता है। |
मैं नवीन हूँ... कागज़ पर एक ग्रेजुएट और सड़क पर एक मज़दूर।
मैं वह आदमी हूँ जो सड़क पर चलता है, ई-रिक्शा चलाता है, मजदूरी करता है और चुनाव के समय नेताओं की बातें सुनता है।
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| "जब सड़क टूटती है, तो राजनीति दिखती है।" - सिर्फ कागज़ों पर हुए विकास और ज़मीन पर मौजूद गहरे कीचड़ की 3 जुलाई 2023 की एक असली तस्वीर। |
चुनाव के समय जनता को वोटर कहा जाता है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही जनता फिर लाइन में खड़ी आम आदमी बन जाती है। कोई राशन के लिए, कोई कागज़ के लिए, कोई योजना के लिए, कोई सड़क के लिए, कोई इलाज के लिए।
मुझे लगता है कि वोट देने वाला आदमी सिर्फ संख्या नहीं है। वह अपनी जिंदगी लेकर वोट देता है। वह उम्मीद लेकर वोट देता है। वह चाहता है कि उसकी सड़क बने, उसका बच्चा पढ़े, उसका काम चले, उसका इलाज हो, उसकी बात सुनी जाए।
लेकिन राजनीति में गरीब आदमी की आवाज़ अक्सर भाषण में रहती है, फैसले में नहीं।
मेरी नज़र में राजनीति का असली सवाल यह है कि वह सबसे नीचे खड़े आदमी तक कितनी पहुँचती है। अगर एक मजदूर को सरकारी योजना लेने के लिए पहले कर्ज लेना पड़े, फिर ब्याज देना पड़े, फिर दफ्तरों में दौड़ना पड़े, फिर भी समय पर राहत न मिले, तो राजनीति सिर्फ नारा बनकर रह जाती है।
- मैं यहाँ किसी पार्टी की तरफ से नहीं लिख रहा।
- मैं एक नागरिक की तरफ से लिख रहा हूँ।
- मेरी राजनीति मेरी सड़क से शुरू होती है।
- मेरी राजनीति मेरे ई-रिक्शा की किस्त से शुरू होती है।
- मेरी राजनीति मेरी मजदूरी से शुरू होती है।
- मेरी राजनीति इस सवाल से शुरू होती है कि गरीब आदमी की आवाज़ कहाँ दर्ज होती है?
अब मैं कोशिश करूँगा कि राजनीति को टीवी की भाषा में नहीं, अपनी जिंदगी की भाषा में समझूँ। जो देखूँगा, उसे लिखूँगा। जो समझूँगा, उसे पूछूँगा। और जहाँ मेरी समझ अधूरी होगी, वहाँ सीखूँगा।



